महासू देवता मंदिर, हनोल
प्रसिद्व महासू देव मंदिर, जिला मुख्यालय देहरा दून से लगभग १८० कि. मी दूर ग्राम हनोल में स्थित है। चकरोता से यह दूरी लगभग ९५ कि मी रह जाती है। इस मंदिर की मान्यता और मदिर वास्तुकार का बहुत महत्व है। चार महासू बाशिक , बोठा , पवासी और चलदा महाराज की जौनसार बावर , बंगान और हिमांचल के सिरमौर , किनौर क्षेत्र में बहुत मान्यता है। मनोकामना पूर्ण हो चार महासू के दर्शन अवश्य करे।
देव दर्शन के लिए उचित माह बैशाख और मांगशीर माने जाते है। हनोल का तापमान गर्मियों में गरम और सर्दिया ठंडा है लेकिन रात प्रयाय ठंडी रहती है कारण हनोल टोंस नदी के किनारे बसा है और दो पहड़ो के बीच में है।
महासू देव का जागड़ा : महासू देव का जगदा भादो माह में नाग चौथ के दिन मनाया जाता है। इस दिन माहाराज की मूर्ती को स्नानं कार्य जाता है और विधि विधान से पूजा की जाती है। महासू देव दर्शन के लिए इस दिन बहुत भीड़ रहती है।
महासू देव मंदिर, कोरुवा
मुण्डाली :
मुंडाली चकराता से ३० कि मी दुरी पर है। इस जगह पर जाने के लिए वन विभाग की सड़क है लेकिन इस पर वाहन चलने के लिए क्षेत्रीय ड्राइवर आवशयक है , यह कच्चा सड़क है तीव्र चढ़ाई-उतराई के वाबजूद पत्थरो भरा संकरा रोड है। एक बार मुंडाली पहुचने के बाद इस लगता है मनो आप स्वर्ग में पहुंच गए हो।
बर्फ से ढकी मुंडाली विशेष स्कीयर स्कीइंग स्थल है। स्की ढलान और उत्कृष्ट ख़स्ता बर्फ मुंडाली स्कीयर के लिए एक स्वर्ग है. बर्फ से ढकी चोटिया शानदार दृशय प्रदान करती है।
गर्मियों के माह अप्रैल से जून और सर्दियों के महीनों नवंबर दिसंबर ट्रैकिंग के लिए सबसे उपयुक्त है।
लाखामंडल
जिला देहरा दून का यह स्थल चकरोता, मसूरी और विकास नगर से वृताकार सड़क से जुड़ा है। लाखामंडल चकरोता से ३७ किमी, मसूरी से ७४ और विकासनगर से लगभग ९० किमी की दुरी पर यमुना नदी के तट पर स्थित है। यह स्थल महाभारत के इतिहास में प्रमुख है । कहा जाता है की कौरांव ने पांडंव को जिन्दा जला देने के लिए लाक्षा गृह यही पर बनाया था इसीलिए इस जगह का नाम स्थानीय भाषा में लाखामंडल कहा जाता है। वर्तमान समय में यह स्थल पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है । यह पर कौरव-पाण्डव से सम्बंधित कई अवशेष संग्रहित किये गए है और उन्हें मिउजियम बना कर लोक दर्शन के लिए रखा गया है। लाखामंडल मंदिर जो की पांच पांडव , केदार और परशुराम जी को समर्पित है, के अंदर से एक सुरंग यमुना तट तक जाती है लेकिन इसमें प्रवेश वर्जित है।
बुधेर गुफा ( Budher
Cave)
चकराता से त्यूणी सड़क पर लगभग ३० किमी की दुरी पर बुधेर गुफाएं, बुधेर नामक स्थान पर स्थित है। बुधेर पहुचने के लिए लोखंडी से लगभग २ किमी लम्बा पैदल रास्ता तैय करना पड़ता है। इन गुफाओ को मोयला कव (cave) के नाम से भी जाना जाता है। गुफाओ के इर्द गिर्द पर्वत छोटी को मोयला टिम्मा या मोयला टॉप के मान से जाना जाता है। अभी तक यह ज्ञात करना मुश्किल है की यह कितनी गुफाएं है और कितनी लम्बी है क्योकि अंत तक पहुचने का रास्ता अत्यंत कठिन और दुर्गम है।माना जाता है की इन गुफाओ का निर्माण पाडंवओ द्वारा महाभारत के समय किया गया था और गुफा की लम्बाई १५०-२०० किमी तक संभव है । हरे घास के मैदान के पास ही गुफा में प्रवेश का रास्ता है लेकिन बिना स्थानीय व्यक्ति के गुफा के अंडर प्रवेश करना जोखिम भरा है । यहाँ की ऊचाई लगभग २८०० मी है । मन और दृष्टि को लुभाने वाला अद्धभुत हरे घास का गोल मैदान महा शिव का स्थल है। इस जगह की खोज सर्वप्रथम जर्मन व्यक्ति मोयला ने की थी , इसीलिए इसे मोयला टॉप कहते है।



No comments:
Post a Comment